Thursday, May 28, 2020

Introduction to SCR | Power Diodes

SCR क्या है :-
thyristor को SCR (silicon controlled rectifier) भी कहा जाता है. यह एक बहुपरत अर्धचालक युक्ति है. इसमें चार परत p और n प्रकार के पदार्थों की होती है जो कि एक के बाद एक लगे रहते हैं. इसमें तीन pn जंक्शन होते हैं.
thyristor में तीन टर्मिनल होते हैं anode, cathode और gate. gate जो है वह cathode के पास वाले p प्रकार के क्षेत्र से जुड़ा रहता है.
डायोड की तरह ही thyristor भी unidirectional युक्ति है और एक ही दिशा में धारा प्रवाहित होने देता है. इसका उपयोग amplification में नहीं किया जा सकता है.
यह एक bistable switch की तरह कार्य करता है.

working of SCR (thyristor) 

एक SCR की कार्यविधि में इसकी कुछ अवस्थाएं होती हैं-
Reverse blocking- इस अवस्था में thyristor एक रिवर्स बायस डायोड की तरह धारा का अवरोध करता है. इस अवस्था में यह सिर्फ एक दिशा में चालन करता है और विपरीत दिशा में अवरोध करता है.
forward blocking- इस अवस्था में thyristor इस प्रकार कार्य करता है कि ये forward धारा को अवरोध करता है. सामान्य डायोड इस तरह की धारा को प्रवाहित होने देता है परन्तु thyristor इसको अवरोधित कर देता है. इस अवस्था में SCR “turn ON” अवस्था में नहीं होता है.
forward conducting- इस अवस्था में thyristor चालन करने लगता है क्योंकि gate पर धारा लागु कर दी जाती है. इस अवस्था में यह चालन करते रहता है चाहे gate पर कोई भी अवस्था हो. thyristor को उत्तेजित करने के लिए ही gate पर धारा लागू की जाती है. यह चालन करना तब बंद करता है जब forward धारा होल्डिंग धारा से कम हो जाती है.

two transistor analogy of thyristor

thyristor में चार अर्धचालक क्षेत्र होते हैं. P,N,P,N. इसको हम दो आपस में जुड़े हुए ट्रांजिस्टर की तरह मान सकते हैं. जिसमे एक pnp transistor(Q1) और एक npn transistor(Q2) होता है. Q1 का emitter SCR के anode टर्मिनल की तरह कार्य करता है और Q2 का emitter SCR के cathode की तरह कार्य करता है. Q1 का base Q2 के कलेक्टर से जुड़ा रहता है. और Q1 का कलेक्टर Q2 के base से जुड़ा रहता है. SCR का gate टर्मिनल Q2 के base से जुड़ा रहता है.

Applications of SCR in Hindi (अनुप्रयोग)

  1. इसका प्रयोग power switching circuit में होता है.
  2. जीरो वोल्टेज switching circuit में भी इसका प्रयोग किया जाता है.
  3. controlled rectifier में इसका उपयोग किया जाता है.
  4. इसका use इन्वर्टर में भी किया जाता है.
  5. AC और DC की गति नियंत्रण में SCR का उपयोग किया जाता है.
  6. light dimmers में भी SCR का प्रयोग किया जाता है.

Power Diodes

डायोड केवल दो परतों, दो टर्मिनलों और एक जंक्शन वाले सबसे सरल अर्धचालक उपकरण हैं। साधारण सिग्नल डायोड में पी टाइप सेमीकंडक्टर और एन टाइप सेमीकंडक्टर द्वारा गठित जंक्शन होता है, लीड जॉइंट पी टाइप को एनोड कहा जाता है और दूसरी साइड लीड को एन टाइप से जोड़ने को कैथोड कहा जाता है। नीचे दिया गया चित्र एक साधारण डायोड और उसके प्रतीक की संरचना को दर्शाता है।
पावर डायोड भी सिग्नल डायोड के समान होते हैं लेकिन इसके निर्माण में थोड़ा अंतर होता है।

सिग्नल डायोड में P और N दोनों पक्षों का डोपिंग स्तर समान होता है और इसलिए हमें एक PN जंक्शन मिलता है, लेकिन पावर डायोड में हमारे पास एक भारी doped P + के बीच एक जंक्शन बनता है और एक हल्का doped N– लेयर होता है जो एपिटैक्सियलली एक भारी पर विकसित होता है। doped N + परत। इसलिए संरचना नीचे की आकृति में दिखाई गई है।

V-I Charecteristics of Power Diodes

forward biased के लिए सिग्नल डायोड में, वर्तमान में तेजी से वृद्धि होती है, हालांकि पावर डायोड में उच्च आगे की ओर उच्च ओमिक ड्रॉप होता है, जो घातीय वृद्धि पर हावी होता है और वक्र लगभग रैखिक रूप से बढ़ता है। अधिकतम रिवर्स वोल्टेज जो डायोड का सामना कर सकता है, उसे वीआरआरएम, यानी पीक रिवर्स रिपिटिटिव वोल्टेज द्वारा दर्शाया गया है। इस वोल्टेज के ऊपर रिवर्स करंट बहुत अधिक अचानक हो जाता है और चूंकि डायोड को इतनी अधिक मात्रा में गर्मी को नष्ट करने के लिए नहीं बनाया गया है, इसलिए यह नष्ट हो सकता है। इस वोल्टेज को पीक इनवर्स वोल्टेज (PIV) भी कहा जा सकता है। 

  

Saturday, May 23, 2020

Communication Skill II - Functional Grammar

Functional Grammar :- grammar that puts together the patterns of the language and the things you can do with them is called a functional grammar; that is, it is based on the relation between the structure of a language and the various functions that the language performs.

Prepositions :-

Prepositions are short words (on, in, to) that usually stand in front of nouns (sometimes also in front of gerund verbs).
Even advanced learners of English find prepositions difficult, as a 1:1 translation is usually not possible. One preposition in your native language might have several translations depending on the situation.
There are hardly any rules as to when to use which preposition. The only way to learn prepositions is looking them up in a dictionary, reading a lot in English (literature) and learning useful phrases off by heart.
The following table contains rules for some of the most frequently used prepositions in English:

Prepositions – Time

EnglishUsageExample
  • on
  • days of the week
  • on Monday
  • in
  • months / seasons
  • time of day
  • year
  • after a certain period of time (when?)
  • in August / in winter
  • in the morning
  • in 2006
  • in an hour
  • at
  • for night
  • for weekend
  • a certain point of time (when?)
  • at night
  • at the weekend
  • at half past nine
  • since
  • from a certain point of time (past till now)
  • since 1980
  • for
  • over a certain period of time (past till now)
  • for 2 years
  • ago
  • a certain time in the past
  • 2 years ago
  • before
  • earlier than a certain point of time
  • before 2004
  • to
  • telling the time
  • ten to six (5:50)
  • past
  • telling the time
  • ten past six (6:10)
  • to / till / until
  • marking the beginning and end of a period of time
  • from Monday to/till Friday
  • till / until
  • in the sense of how long something is going to last
  • He is on holiday until Friday.
  • by
  • in the sense of at the latest
  • up to a certain time
  • I will be back by 6 o’clock.
  • By 11 o'clock, I had read five pages.



Frame questions :-



The interrogative pronouns who, what, whom, whose, which and the interrogative adverbs where, when, why and how are used to frame information questions.
The structure ‘how + an adjective/adverb’ may also be used to frame information questions.
Make meaningful questions using the interrogative pronouns given above.
1. ..................................... books are these?
(A) Who's
(B) Whose
(C) Whos

Conjunctions :-

What is a conjunction?

A conjunction is a part of speech that is used to connect words, phrases, clauses, or sentences. Conjunctions are considered to be invariable grammar particle, and they may or may not stand between items they conjoin.

Conjunction Rules

There are a few important rules for using conjunctions. Remember them and you will find that your writing flows better:
  • Conjunctions are for connecting thoughts, actions, and ideas as well as nouns, clauses, and other parts of speech. For example: Mary went to the supermarket and bought oranges.
  • Conjunctions are useful for making lists. For example: We made pancakes, eggs, and coffee for breakfast.
  • When using conjunctions, make sure that all the parts of your sentences agree. For example: “I work busily yet am careful” does not agree. “I work busily yet carefully” shows agreement.

Conjunctions List

There are only a few common conjunctions, yet these words perform many functions: They present explanations, ideas, exceptions, consequences, and contrasts. Here is a list of conjunctions commonly used in American English:
  • And
  • As
  • Because
  • But
  • For
  • Just as
  • Or
  • Neither
  • Nor
  • Not only
  • So
  • Whether
  • Yet
  • Examples of Conjunctions :-

    In the following examples, the conjunctions are in bold for easy recognition:
    • I tried to hit the nail but hit my thumb instead.
    • I have two goldfish and a cat.
    • I’d like a bike for commuting to work.
    • You can have peach ice cream or a brownie sundae.
    • Neither the black dress nor the gray one looks right on me.
    • My dad always worked hard so we could afford the things we wanted.
    • I try very hard in school yet I am not receiving good grades.

    Conjunction Exercises :-

    The following exercises will help you gain greater understanding about how conjunctions work. Choose the best answer to complete each sentence.

Tense (काल )

सबसे पहले सवाल आता है की Tenses क्या है ? Tense का मतलब है क्रिया के विभिन्न रूप जैसे कोई भी काम (क्रिया) जब होती है या की जाती है तब वह कई Parts में Devide कर सकते हैं, जिन्हे हम क्रिया के विभिन्न रूप कह सकते हैं।
मान लीजिये आज आपने एक काम किया है या कर रहे हैं, इस Condition में हम उसे वर्तमान काल (Present Tense) कहेंगे, लेकिन कुछ समय बाद हम आपसे पूछे आपने उस काम कोई किया तो आप कहेंगे की हाँ मै उस काम को कर चूका हूँ, अर्थात आपका वही कार्य जो की आपने पहले ही पूरा कर लिया उसे आप भूत काल (Past Tense) कहेंगे क्योंकि वह आप पहले ही कर चुके हैं।
इसी प्रकार जब आप किसी कार्य को करते हैं तो उससे पहले यह सोचते हैं की आपको वह कार्य करना है लकिन अभी आपने सिर्फ सोचा है और किया नहीं है जिसका मतलब है की आप थोड़ी देर में उस कार्य को करेंगे अर्थात भविष्य में आप उस काम को करेंगे लेकिन अभी किया नहीं है सिर्फ सोचा है तो अगर उसे Explain करना हो तो आप यही कहोगे की आप उस काम को करोगे इसलिए उसे भविष्य काल (Future Tense) कहेंगे, इस प्रकार जब किसी भी काम को करने के लिए ही आपको तीन Tenses मिल जाते हैं।

Tense के प्रकार


Tense का साधारण अर्थ काल होता है लेकिन हम काल को समय भी कह सकते हैं जिससे आप आसानी से समझ सकते हैं-
  1. वर्तमान काल (Present)- जो की चल रहा हो जैसे (मै खेल रहा हूँ)
  2. भूत काल (Past)- जो की बीत चूका हो जैसे (मै खेल रहा था)
  3. भविष्य काल (Future)– जो की आने वाला है (मै थोड़ी देर में खेलूँगा)
इन तीनों Tenses के भी कुछ भाग होते हैं जैसे-
  1. Indifinite
  2. Continious
  3. Perfect
  4. Perfect Contifious
अब इन चारों Indifinite, Continious, Perfect और Perfect Continious के साथ आपको Present, Past और Future Tenses के साथ Mix करना होता है। जिसे हम Tense Formula Chart के माध्यम से समझते हैं।

Tense Formula Chart

चलिए अब हम समझते हैं की हम ऊपर दिए गए Tense Formula का इस्तिमाल कैसे कर सकते हैं-
सबसे पहले Tense के तीन प्रकार होते हैं
  • Present (जो की चल रहा है)
  • Past (जो की बीत चूका है)
  • Future (जो की भविष्य में होगा)
इसी प्रकार इन सभी Tense के  भी चार भाग होते हैं
  • Indifinite- इस प्रकार के वाक्य के अंत में (ता, ती, ते) जैसे शब्द आते हैं।
  • Continious- इस प्रकार के वाक्य के अंत में (रहा, रही, रहे) जैसे शब्द आते हैं।
  • Perfect- इस प्रकार के वाक्य में अंत में (चूका, चुकी, चुके) जैसे शब्द आते हैं।
  • Perfect Continious- इस प्रकार के वाक्य के (रहा, रही, रहे) के साथ-साथ समय दिया गया हो जैसे शब्द आते हैं।
अब चलिए इन चरों भागों को हम Tenses के तीनों भागों के साथ जोड़ते हैं जिसे आप आसान भाषा में Tense के Rules भी कह सकते हैं।

Tense Rules Chart

यहाँ हम तीनों Tenses को चरों भागों के साथ जोड़ेंगे और आप आप अच्छी तरह से समझ सकें इसके लिए हम कुछ Examples का भी प्रयोग करेंगे-

Present Tense के Rules

  • Present Indifinite- वह कार्य जो की स्थायी हो जैसे – मै खेलता हूँ (I Play)
  • Present Continious- वह कार्य जो निरंतर चल रहा है जैसे – मै खेल रहा हूँ (I am Playing)
  • Present Perfect- वह कार्य जो बिलकुल अभी ख़त्म हुआ है- मै खेला हूँ (I have Play)
  • Present Perfect Continious- वह कार्य जो की एक समय से चल रहा है – में खेल रहा हूँ (I have been Playing)

Past Tense के Rules

  • Past Indifinite- मै खेलता था (I Played)
  • Past Continious- मै खेल रहा था (I was Playing)
  • Past Perfect- मै खेला था (I had Played)
  • Past Perfect Continious- मै खेल रहा था (I had been Playing)

Future Tense के Rules

  • Future Indifinite- मै खेलूंगा (I shall Play)
  • Future Continious- मै खेल रहा हूँगा (I shall been Playing)
  • Future Perfect- मै खेला हूँगा (I shall have played)
  • Future Perfect Continious- मै खेल रहा हूँगा (I shall have been playing)


ENERGY CONSERVATION - उर्जा संरक्षण

 ऊर्जा :-
कार्य करने की क्षमता को उर्जा कहते है उर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट |
ऊर्जा का दैनिक जीवन में महत्त्वएक औसत घर में लगभग सभी प्रकार की क्रियाकलापों जैसे रोशनी, शीतलन व घर के ऊष्मण के लिये, भोजन पकाने के लिये, टी-वी-, कम्प्यूटर व अन्य वैद्युत यंत्रों को चलाने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है।

ऊर्जा ने सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक आपके जीवन को प्रभावित किया है। इसके बिना जीवनयापन व कहीं आना-जाना लोगों के लिये कठिन होगा। ऊर्जा, चाहे वह सौर ऊर्जा हो, नाभिकीय ऊर्जा हो या वह ऊर्जा जो हमारे शरीर में बनाती है; जिससे हम बात करते हैं और चलते हैं, आवश्यक है। ये साधारण कार्य हैं, जिन्हें हम ऊर्जा की सहायता से संपन्न करते हैं और उसके अभाव में नहीं कर सकते।

आप सम्भवतः अपने विद्यालय जाते समय रास्ते में ट्रैफिक लाइट देखते होंगे, जो विद्युत से चलती है। बिना ट्रैफिक लाइट के कारें अव्यवस्थित रूप से चलती हैं और दुर्घटना हो सकती है। जब आप पैदल विद्यालय जाते हो तो शरीर भोजन से जो ऊर्जा प्राप्त करता है, उसका उपयोग करते हो। आप अंधेरा होने पर अवश्य ही घर में लाइट जलाते होंगे। विद्युत के द्वारा आप अपने कमरे में रोशनी करके उसे चमकदार बनाते हों।

यातायात के क्षेत्र में बस, ट्रक, रेलगाड़ियाँ, पानी के जहाज, मोटरें इत्यादि कोयले, गैसोलीन, डीजल व गैस इत्यादि से चलती हैं। ये सभी जीवाश्म ईंधन हैं और इनके अतिदोहन के कारण इनका अभाव हो रहा है।

कृषि के क्षेत्र में सिंचाई वाले पम्प, डीजल (एक जीवाश्म ईंधन) या विद्युत से चलते हैं। ट्रैक्टर, थ्रैसर व संयुक्त हारवेस्टर (फसल काटने वाला) सभी ईंधन से चलते हैं।

उद्योगों के क्षेत्र में माल बनाने के लिये विभिन्न स्तरों पर बड़ी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

यह सर्वमान्य है कि ऊर्जा वित्तीय विकास व मानव विकास के लिये एक प्रमुख निवेश है। भारत में ऊर्जा क्षेत्र को योजना प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

ऊर्जा और आर्थिक विकास :-

ऊर्जा विकास, आर्थिक विकास का एक अभिन्न अंग है। विकासशील देशों की तुलना में आर्थिक रूप से विकसित देशों के आर्थिक उत्पादन में प्रति इकाई अधिक ऊर्जा का उपयोग होता है और प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत भी अधिक है। ऊर्जा को सार्वभौमिक व मानव विकास के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण निवेश माना जाता है। अर्थव्यवस्था की वृद्धि के लिये वैश्विक प्रतिस्पर्धा का खड़े होकर सामना तभी कर सकेंगे। जब यह लागत प्रभावी व सस्ती और पारिहितैषी ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर होगी।

ऊर्जा खपत इस बात का संकेत करती है कि अर्थव्यवस्था में ऊर्जा को किस कुशलता से प्रयोग किया गया है। भारत की ऊर्जा खपत अन्य उभरते एशियाई देशों की खपत से अधिक है।

भारत में ऊर्जा क्षेत्र को नियोजन प्रक्रिया में उच्च प्राथमिकता प्राप्त है। भारत सरकार ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि ऊर्जा क्षेत्र, एक उच्च विकास दर प्राप्त करने का सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product GDP) की उपलब्धि में एक प्रमुख बाधा बन सकता है। अतः सुधार प्रक्रिया में तेजी लाने और एकीकृत ऊर्जा नीति अपनाने की आवश्यकता है।



ऊर्जा संरक्षण

जैसे कि आप पहले जान चुके हो कि औद्योगिक विकास व यातायात के आधुनिक साधनों और विभिन्न प्रकार के यंत्रों हेतु ऊर्जा की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। जीवाश्म ईंधन सार्वभौमिक ऊर्जा का मुख्य स्रोत है, जो सीमित और अनवीकरणीय भी हैं। इसीलिये यह आवश्यक है कि हम ऊर्जा के दुरुपयोग को रोकें और ऊर्जा संरक्षण के लिये प्रयास करें। प्रतिदीप्ति प्रकाश बल्बों, ऊर्जा कुशल उपकरणों और कम उत्सर्जक काँचों का प्रयोग, ऊर्जा उपभोग को कम करने में महत्त्वपूर्ण है। अगर ऊर्जा के स्रोत समाप्त हो गए तो हम अपने कर्तव्य में विफल हो जाएँगे। यह हमारी अगली पीढ़ी के प्रति हमारा उत्तरदायित्व है। ऊर्जा का संरक्षण प्रत्येक मनुष्य के दैनिक जीवन का कर्त्तव्य होना चाहिए। ऊर्जा संरक्षण हेतु व्यक्तिगत, सामुदायिक व सरकारी स्तर पर गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है।

विभिन्न स्तरों पर ऊर्जा का संरक्षण
(क) घर के स्तर पर ऊर्जा का संरक्षण


प्रत्येक देश के निवासियों की मांग, उस देश में प्रयोग की जाने वाली ऊर्जा का एक प्रमुख भाग होती है। एक आम घर की ऊर्जा-हितैषी घरों से तुलना करने पर, वार्षिक ऊर्जा बिल को 40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। हमें अपने घरों के लिये एक ऊर्जा संरक्षण योजना विकसित करनी चाहिए। यह पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ एक आर्थिक रूप से सफल प्रक्रिया है।

अपने घरों हेतु ऊर्जा संरक्षण योजना बनाने के प्रमुख क्रम हैं: (1) उन समस्या क्षेत्रों को पहचानना जहाँ ऊर्जा नष्ट होती है या उसका कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं किया जाता। (2) समस्या क्षेत्रों को इस प्राथमिकता के अनुसार रखना कि वहाँ कितनी ऊर्जा नष्ट होती है या उसका कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं किया जाता। (3) अपने घर के ऊर्जा सुधार बजट के अनुसार प्राथमिकता के आधार पर योजनाबद्ध तरीके से समस्याओं का निराकरण करना।

बल्बों व पंखों के अतिरिक्त बहुत सारे घरेलू उपकरण बाजार में उपलब्ध हैं। उच्च गुणवत्ता वाले वैद्युत उपकरणों (पाँच सितारा दर वाले) का प्रयोग व उनका कुशल संचालन न केवल उनकी क्षमता को बढ़ाता है बल्कि ऊर्जा भी बचाता है। कुछ ऊर्जा संरक्षण प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं:-

(i) प्रमुख घरेलू उपकरणों के प्रयोग हेतु

बड़े घरेलू उपकरणों में प्रमुख रूप से अधिक ऊर्जा व्यय होती और ऐसे घरेलू उपकरणों की कार्यक्षमता को विकसित करके विद्युत के सकल घरेलू उपभोग को उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकता है।

(अ) फ्रिज (Refrigerator)

क्या आप जानते हो कि फ्रिज ऊर्जा के एक बहुत बड़े भाग का उपभोग करता है? संघनित्र (Condenser) या तो फ्रिज के नीचे पाया जाता है या उसके पीछे और उसके निम्न तापमान को नियंत्रित करने में सहायक होता है। हम फ्रिज का प्रयोग करते समय निम्न प्रकार से ऊर्जा का संरक्षण कर सकते हैं:-

1. इसे 37°F - 400°F पर रखना चाहिए और फ्रीजर को 50°F और इसमें स्वचालित आर्द्रता नियंत्रित होनी चाहिए।

2. हमें फ्रिज को पूर्णतः भरा रखना चाहिए और इसकी स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि इसकी बाह्यसतह पर सीधे सूर्य का प्रकाश न पड़े।

3. अगर फ्रिज का दरवाजा ठीक से बंद नहीं होगा तो यह अधिक ऊर्जा का उपभोग करेगा। खुले तरल पदार्थ फ्रिज में नहीं रखने चाहिए क्योंकि यह कंप्रेशर पर अतिरिक्त बोझ डालेगा।

4. फ्रिज में भोजन रखने से पहले उसे कमरे के तापमान तक ठण्डा करना चाहिए।

5. फ्रिज का दरवाजा बार-बार नहीं खोलना चाहिए।

(ब) ओवन/माइक्रोवेव ओवन (Ovens/Microwave Oven)

ओवन का प्रयोग करते समय ऊर्जा संरक्षण हेतु हमें निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए-

1. हमें माइक्रोवेव ओवन का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि यह परम्परागत ओवन से 50% कम ऊर्जा का प्रयोग करते हैं।
2. ओवन के दरवाजे में कोई दरार या टूटा नहीं होनी चाहिए।
3. तापमान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु हमें भोजन ‘ढक्कन खोलकर’ बनाना चाहिए।
4. हमें प्रतिक्षेपक पैन (Reflector pan) को स्टॉव टॉप के चमकदार व स्पष्ट हीटिंग एलीमेन्ट के नीचे रखना चाहिए।
5. ऊर्जा के उपभोग को कम करने हेतु हमें पानी का सावधानी से प्रयोग करना चाहिए।
6. खाना पकाते समय, तरल पदार्थ के उबलने तक अधिक ऊर्जा का प्रयोग करना चाहिए। उसके पश्चात खाने को धीमी आँच पर पकाना चाहिए।
7. एक समय में अधिक से अधिक सम्भावित भोजन ओवन में पकाना चाहिए।
8. ओवन की शेल्फ को ओवन चालू करने से पहले पुनर्व्यवस्थित करना चाहिए और ओवन में बार-बार नहीं झांकना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक बार ओवन के खुलने पर उसका तापमान 4-5°C कम हो जाता है।
9. खाना पकाने से पहले ओवन को कुछ मिनट के लिये गर्म करना पर्याप्त होगा।
10. मुख्यतः गैस पर बनी वस्तुओं के लिये स्टोवटॉप परन्तु खाना पकाना उचित है।

(स) इस्त्री करना (Ironing)

प्रतिदिन हम अपने कपड़ों को इस्त्री करते हैं। यह लगभग 1000 वॉट ऊर्जा का उपभोग करते हैं, जो कि एक बड़ी मात्रा है। लेकिन हम एक या दो कपड़े एक बार में इस्त्री करने के स्थान पर थोक में कपड़ों को इस्त्री करके ऊर्जा को बचा सकते हैं। यह सुनिश्चित करें कि इस्त्री का तापस्थायी (Thermostat) काम कर रहा है और कपड़ा इस्त्री करने हेतु सही तापमान निश्चित करें।

(द) खाना पकाना

खाना पकाने में ऊर्जा के बड़े भाग का उपभोग किया जाता है। खाना बनाते समय इन सावधानियों के द्वारा ऊर्जा बचाई जा सकती है। खाना पकाने हेतु खाना पकाने के बरतन कुकर प्लेट, कॉयल (Coil) या बर्नर से थोड़ा बड़ा होना चाहिए। सॉसपैन का ढक्कन खुला होना चाहिए। एक बार भोजन उबलने के पश्चात आँच धीमी कर देनी चाहिए।

(न) धुलाई की मशीन (Washing Machine)

धुलाई की मशीन 20% विद्युत का उपभोग करती है। धुलाई की मशीन का प्रयोग करते समय निम्न प्रकार से ऊर्जा बचायी जा सकती हैः

1. हमें काम करते समय व कपड़े धोते समय ठण्डे पानी का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि 90% ऊर्जा धुलाई की मशीन द्वारा पानी को गर्म करने में प्रयोग होती है।

2. डिटरजेन्ट प्रयोग करने के निर्देशों का सावधानी से पालन करना चाहिए। अच्छे परिणाम हेतु अधिक डिटरजेन्ट का प्रयोग करने से अधिक ऊर्जा का उपभोग होता है।

3. मशीन को कपड़ों के पूर्णभार के साथ होना चाहिए लेकिन मशीन पर अतिरिक्त भार नहीं डालना चाहिए।

4. ऊर्जा खपत को कम करने के लिये कपड़ों को पहले भिगोकर धोना चाहिए।

(ii) बिजली/रोशनी (Lighting)

विश्व में ऊर्जा की बढ़ती हुई मांग व ऊर्जा के प्रतिदिन बढ़ते मूल्य ने गहन ऊर्जा प्रौद्योगिकियों की ऊर्जा क्षमता को सुधारने हेतु एक तर्कसंगत कारण दिया है। बिजली का प्रयोग करते समय ऊर्जा को बचाने की कुछ विधियाँ निम्नलिखित हैं:

1. बिजली का प्रयोग न होने पर उसे बंद कर देना चाहिए।

2. दिन के समय अधिक से अधिक सौर ऊर्जा का प्रयोग करना चाहिए। बल्ब व ट्यूबलाइट का दिन में प्रयोग नहीं करना चाहिए।

3. सम्पूर्ण क्षेत्र या कमरे में रोशनी करने के स्थान पर सिर्फ काम करने के स्थान पर रोशनी का प्रयोग करना चाहिए।

4. तापदीप्त बल्ब (Incandescent bulbs) के स्थान पर कॉम्पैक्ट फ्लोरसेंट लैम्प (CFL, Compact fluorescent lamps) का प्रयोग करना चाहिए। एक 23 वॉट का सीएफएल, 90 या 100 वाट के बल्ब का स्थान ले सकता है।

5. कम्प्यूटर, टी.वी., टेप रिकार्डर, संगीत प्रणाली इत्यादि को खुला न छोड़ें। क्या तुम जानते हो कि टी.वी. को बंद करके तुम कितनी बिजली बचा सकते हो? तुम 70 किलावॉट/घंटा प्रतिवर्ष बिजली बचा सकते हो।

6. गीजर से सर्वाधिक ऊर्जा की खपत होती है। तापस्थायी (Thermostat) को निम्न तापमान 45° से 50°C पर नियत किया जा सकता है।

7. बल्ब कमरे में ऐसे स्थानों पर रखने चाहिए जिससे वे एक रोशनी सतह के स्थान पर कई कोनों को आलोकित कर सकें।

8. जहाँ तक सम्भव हो, धीमे किए जा सकने वाले बल्बों का प्रयोग करें।

(iii) विद्युत संरक्षण (Electricity Conservation)

वैश्विक ऊर्जा संसाधनों के निष्कर्षण तथा ऊर्जा उपभोग के प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति बढ़ती हुई जागरूकता के कारण, ऊर्जा कुशल यंत्रों व तकनीकों को विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। जिससे ऊर्जा व्यय व पर्यावरणीय संकटों को कम किया जा सके। इस प्रकार के कुछ चरण निम्नलिखित हैं:-

i. ISI चिन्हित उपकरणों का प्रयोग करना चाहिये।
ii. बल्ब के स्थान पर टंगस्टन फिलामेंट लैम्प (TLP) ट्यूब का प्रयोग कीजिए।
iii. CFLs (कम्पैक्ट फ्लोरोसेंट लैम्प) का प्रयोग करना चाहिए क्योकि इसमें अपेक्षाकृत कम विद्युत खर्च होती है व ये अधिक चलते हैं।
iv. विद्युत बचाने हेतु वैद्युत गीजरों के स्थान पर गैस गीजर का प्रयोग करना चाहिए।

(iv) अन्य

कुछ अन्य विधियाँ, जिनके द्वारा ऊर्जा की बचत की जा सकती है, इस प्रकार हैं:-

1. खाना पकाने हेतु गैस उपकरणों की जाँच समायोजित होनी चाहिए, जिससे आँच लाल या पीली के स्थान पर नीली रहे।
2. जब कम्प्यूटर प्रयोग में न हो तो उसे बंद कर देना चाहिए।
3. ऐसे उपकरणों (जैसे-कर्लिंग इस्त्री, कॉफी पात्र, इस्त्री) का प्रयोग करना चाहिए जो समयानुसार स्वयं बंद हो जाएँ।
4. पुराने टी.वी., वी.सी.आर. इत्यादि उपकरणों को आवश्यकता पड़ने पर ऊर्जा हितैषी नमूनों से बदल देना चाहिए।

(v) शीतलन (Cooling)

शीतलन में ऊर्जा के एक बड़े भाग की खपत होती है। ऊर्जा संरक्षण हेतु निम्नलिखित शीतलन उपाय किए जा सकते हैं:-

1. ठण्डी हवा के लिये रात में खिड़कियाँ खोल देनी चाहिए।
2. दिन के समय खिड़कियाँ बन्द रखनी चाहिए।
3. पश्चिम की ओर पड़ने वाली खिड़कियों पर पर्दे लगे होने चाहिए। रात की ठण्डी हवा के लिये घर में एक बड़े पंखे का प्रयोग किया जा सकता है।
4. वातानुकूलन का प्रयोग जब आवश्यकता हो तभी करना चाहिए व ऊर्जा हितैषी मॉडल स्थापित किए जाने चाहिए।
5. वातानुकूलित घरों में शीतलन को 25°C पर स्थिर रखना चाहिए।
6. वातानुकूलन प्रणाली के फिल्टरों व संघनित्र (कन्डेन्सर) की नियमित सफाई से ऊर्जा की बचत होती है।

(ख) सामुदायिक स्तर पर ऊर्जा का संरक्षण

सम्पूर्ण विश्व में ऊर्जा संरक्षण एक बहुत ही संवेदनशील विषय है। एक समाज, जहाँ धन व मुख्यतः आर्थिक रूप से लाभप्रद विकल्प हमारे लिये उपस्थित हों, ऊर्जा संरक्षण हेतु निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिएः

1. अनावश्यक रोशनी को बंद कर देना चाहिए। मुख्यतः जब सम्मेलन कक्ष इत्यादि प्रयोग में न आ रहे हों।
2. सर्वाधिक मांग के घण्टों के समय ऊर्जा का उपभोग कम करना चाहिए।
3. कम्प्यूटर सेट, मॉनिटरों, फोटोकॉपियरों व अन्य व्यापारिक उपकरणों को उनकी ऊर्जा संरक्षण प्रणाली पर रखना चाहिए। लम्बे खाली घण्टों के समय जैसे दोपहर के भोजन के समय इन्हें बंद कर देना चाहिए।
4. गोदामों (Were house) हेतु आकाशीय रोशनी का प्रयोग करना चाहिए।
5. यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वातानुकूलनयुक्त कार्यालयों में उचित खिड़कियाँ हों और वातानुकूलन प्रयोग में हो तब सारे दरवाजे बंद हों।

(i) नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों का प्रयोग

अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के स्थान पर वैकल्पिक संसाधनों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों, उदाहरण हेतु सौर ऊर्जा, बायो गैस, वायु ऊर्जा इत्यादि का प्रयोग करना चाहिए। नियमित अंतराल पर घरों, भवनों, होटलों व कारखानों में ऊर्जा की जाँच की जानी चाहिए।

सामुदायिक स्तर पर ऐसी परियोजनाओं का प्रदर्शन किया जाना चाहिए जो उचित, नवीकरणीय सौर तकनीकों से संबंधित हों जैसे जल-शुद्धिकरण व लॉन की सिंचाई, खेल के मैदानों, बगीचों, सामुदायिक केन्द्रों की सिंचाई के लिये सौर पम्प का प्रयोग करना चाहिए व खाना पकाते और उसे गर्म करने के लिये सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहिए। वायुजनित ऊर्जा से संबंधित परियोजनाएँ जो समुदाय और नगरपालिका की आवश्यकता से संबंधित हैं, उन्हें सम्पूर्ण समुदाय के समक्ष प्रदर्शित करना चाहिए। बायोगैस का कुशलतापूर्वक उपयोग लोगों के मध्य उससे संबंधित कार्यक्रमों का प्रदर्शन आवश्यक है। सस्ते व टिकाऊ ऊर्जा संसाधनों के विकास हेतु शैक्षिक शोध व विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

व्यक्तिगत इंजिनचलित यातायात के प्रयोग कम करने हेतु वातावरण हितैषी सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। समान उद्देश्य हेतु न्यूनतम वाहनों का प्रयोग किया जाना चाहिए। यह CO2 के उत्सर्जन को कम करने में भी सहायक सिद्ध होगा।

(ii) गृह समूहों हेतु सामुदायिक स्तर पर ऊर्जा संरक्षण

हमें प्रत्येक कार्य हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है जैसे- खाना पकाना, रोशनी, शीतलन, यातायात इत्यादि। ऊर्जा की वह मात्रा जो क्षय होती है, उससे ऊर्जा की वह मात्रा जो प्रयोग की जाती है, अपेक्षाकृत अधिक होती है। ऊर्जा की बचत आवश्यक है क्योंकि ऊर्जा संसाधन तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं। इसके लिये सामुदायिक स्तर पर निम्नलिखित उपाए किए जा सकते हैं:

1. प्रकाश वैद्युत नियमकों या टाइमर का दिन के समय बाहर पर्याप्त रोशनी को सुनिश्चित करने हेतु किया जाना चाहिए। खुले क्षेत्रों या प्रांगणों की बिजली सूर्योदय के पश्चात बंद कर देनी चाहिए और सूर्यास्त के पश्चात पुनः जलानी चाहिए। सामान्य क्षेत्रों व सीढ़ियों के खत्म होने के स्थान पर ट्यूबलाइट कम होनी चाहिए व जुड़वा ट्यूबलाइट के स्थान पर एक ट्यूबलाइट का प्रयोग होना चाहिए। प्रत्येक कमरे में वैद्युत प्रकाश बिंदुओं की संख्या को एक तक सीमित किया जा सकता है। सभी अतिरिक्त फिटिंग को सदैव के लिये हटा देना चाहिए या बंद रखना चाहिए।

2. जल पम्पों को कम उपयोगिता के घण्टों के समय बंद रखना चाहिए।

3. उत्तोलक (Elevator)/ लिफ्ट का प्रयोग तीसरे माले से ऊपर जाने हेतु करना चाहिए व नीचे उतरने हेतु उत्तोलक का प्रयोग कम करना चाहिए। जब दो एलीवेटरों/लिफ्ट किसी इमारत में लगी हों तो कम उपयोगिता के घंटों में केवल एक ही चालू रखनी चाहिए। बच्चों को ऐलीवेटरों के साथ खेलने से रोकना चाहिए।

4. GHC गैसयुक्त वातावरण अनुकूल यातायात अधिक लाभदायी व प्रदूषण को कम करने में सहायक सिद्ध होगा।

5. जल निकायों जैसे-तालाबों, नदियों व तटीय क्षेत्रों का संरक्षण व अनुकूलतम प्रयोग सामुदायिक स्तर पर ऊर्जा के संरक्षण हेतु सहायक होगा।

6. सामुदायिक स्तर पर ऊर्जा के संरक्षण हेतु ऊर्जा कुशल मरम्मत प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। अकुशल व ऊर्जा के प्रदूषित स्रोतों को हटाने की वकालत आवश्यक हो गई है। लकड़ी के कोयले व ईंधन की खपत को कम करने हेतु स्थायी रूप से निर्मित खाना पकाने के उन्नत स्रोत का प्रयोग किया जाना चाहिए।

(ग) उद्योगों व अन्य स्थानों पर ऊर्जा संरक्षण

ऊर्जा संरक्षण, उपभोग की जाने वाली ऊर्जा की मात्रा को कम करने का अभ्यास है। यह ऊर्जा सेवाओं की कम खपत से या ऊर्जा के कुशल प्रयोग द्वारा संरक्षित की जा सकती है। ऊर्जा के उपभोग को कम करके भी समान परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। विभिन्न स्थानों जैसे- कारखानों, व्यापारिक केन्द्रों, यातायात क्षेत्रों व निर्माण क्रियाओं में ऊर्जा को निम्न प्रकार से संरक्षित किया जा सकता हैः

(i) कारखानों और व्यापारिक केन्द्रों के साथ-साथ दुकानों पर
(क) ऊर्जा की जाँच


ऊर्जा उपभोग के नियमित निरीक्षण व जाँच से ऊर्जा का संरक्षण हुआ है।

(ख) संशोधन प्रक्रिया

संशोधन प्रक्रिया का अर्थ है पुरानी व अधिक ऊर्जा की खपत करने वाली प्रक्रियाओं को नई ऊर्जा कुशल प्रक्रियाओं से प्रतिस्थापित करना। अब पुराने कारखानों को संशोधन प्रक्रिया का प्रयोग करना चाहिए।

(ग) उन्नत माप उपकरण

हम ऊर्जा संरक्षण हेतु नई तकनीकों व ऊर्जा कुशल उपकरणों व प्रक्रियाओं का प्रयोग कर सकते हैं।

(घ) ऊर्जा हानि में कमी

प्रतिदिन एक बड़ी मात्रा में ऊर्जा की क्षति होती है। हम ऊर्जा क्षय को निम्न उपायों द्वारा कम कर सकते हैं जैसे ईंधन टैंक का तापीय ऊष्मारोधन (थर्मल इन्सुलेशन) किया जा सकता है। चीनी मिट्टी भट्ठियों के सीलिंग रेशों, पारंपरिक भाप ऊष्मण करने के स्थान पर तरल ईंधन लाइनों की अनुरेखण विद्युत ट्रेसिंग द्वारा।

(ड.) बिजली के लोड में कमी

बिजली का उपयोग कम करके उल्लेखनीय मात्रा में ऊर्जा की बचत की जा सकती है। बल्बों को ट्यूब लाइट से प्रतिस्थापित कर दिया गया है। आजकल रोशनी हेतु ऊर्जा की खपत को कम करने में सीएफएल का प्रयोग काफी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ है।

(च) यातायात क्षेत्र में ऊर्जा संरक्षण

परिवहन का अर्थ उन सभी वाहनों से है जो व्यक्तिगत या माल ढोने हेतु प्रयोग किए जाते हैं। क्या आप जानते हो कि इस क्षेत्र में लगभग 65 % ऊर्जा मुख्यतः गैसोलीन द्वारा चलने वाले व्यक्तिगत वाहनों द्वारा प्रयोग की जाती है। डीजल से चलने वाले वाहन (रेलगाड़ियाँ, व्यापारिक जहाज, भारी ट्रक इत्यादि) लगभग 20 % और हवाई यातायात शेष का अधिकतम 15 % प्रयोग करते हैं। परिवहन क्षेत्र में ऊर्जा को निम्नलिखित प्रकार से संरक्षित किया जा सकता हैः

(i) ईंधन की खपत में कमी

ईंधन की खपत को निम्नलिखित प्रकार से कम किया जा सकता हैः

1. स्ववाहनों के स्थान पर अधिक से अधिक सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करें।
2. कार की गति जहाँ तक सम्भव हो 50 से 60 किमी/घंटा नियत होनी चाहिए।
3. जब तक आवश्यक न हो, चोक का प्रयोग न करें। जब चोक का प्रयोग करें, इंजन गर्म होते ही इसे बंद कर दें। यदि वाहन चलाने में अवरोध हो तो इंजन के संचालन हेतु क्लच दबाएँ।
4. ईंधन की खपत कम करने के लिये अनावश्यक संचालन व रुकने से बचें। क्लच पैडल को धीरे-धीरे छोड़ें और साथ ही साथ एक्सीलेटर को गाड़ी दौड़ाने या झटके हेतु दबाएँ।
5. डीक्लच (declutch) इंजन को कभी न दौड़ाएँ। गीयर बदलते समय क्लच पैडल पर क्लच को पूरी तरह से छोड़ें क्योंकि यह क्लच वेयर और ईंधन उपभोग को बढ़ाता है।
6. हैण्ड ब्रेक लगा होने पर गाड़ी कभी न चलाएँ। गर्मी देने वाले प्रकाश उपकरण लगाएँ। जहाँ तक सम्भव हो ब्रेक धीरे-धीरे लगाएँ। आवश्यक होने पर ही ब्रेक लगाएँ। ढाल (नीचे/ऊपर) पर सही समय पर निचले गियर बदलें। ये सभी ऊर्जा की खपत को कम करने में सहायक होंगे।
7. यदि सम्भव हो तो निवास कार्य स्थल के समीप होना अधिक उचित होगा।

(ii) ईंधन अर्थव्यवस्था-अधिकतम करने हेतु व्यवहार

ईंधन अर्थव्यवस्था अधिकतम करने हेतु व्यवहार उस तकनीक को वर्णित करता है जिससे चालक अपने वाहन की ईंधन अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर सकते हैं। वाहन चलाते समय ईंधन के उपभोग से विभिन्न विधियों द्वारा ऊर्जा क्षय होता है, जैसे- अकुशल इंजन, वायुगतिक बाधा, झुकाव का घर्षण और ब्रेक द्वारा होने वाली गतिज ऊर्जा की हानि। इस हेतु निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं :

i. संयमित चालन
ii. कम गति पर चालन
iii. क्रूज नियंत्रण का प्रयोग (गति नियंत्रक या स्व-क्रूज गति को नियंत्रित करते हैं और ड्राइवर द्वारा स्थिर गति बनाए रखने में सहयोगी होते हैं)।
iv. स्टॉप पर वाहनों के इंजनों को बेकार चालू रखने के स्थान पर उसे बंद कर देना चाहिए।
v. हाइवे गति सामान्यतः 55 मील/घंटा (वाहनों की संख्या के साथ बदलती है) से ऊपर होने पर वाहन का गैस लाभ तीव्रता से घटता है।

पाठगत प्रश्न 31.2

1. कोई एक उद्देश्य बताइए जिसके लिये समुदाय द्वारा सोलर पम्प स्थापित किया जाना चाहिए।
3. कार्यस्थलों पर ऊर्जा की नियमित निगरानी व जाँच क्यों होनी चाहिए?
4. कार पूल क्या है? और कार पूल पेट्रोल के संरक्षण में किस प्रकार सहायक है?

ऊर्जा कुशल भवनों की अवधारणा
ऊर्जा कुशल यंत्र (Energy efficient device)


हम देख रहे हैं कि दिन-प्रतिदिन पूरे विश्व में ऊर्जा की खपत बढ़ रही है और जैसे-जैसे खपत बढ़ रही है। ऊर्जा के दाम भी बढ़ रहे हैं। अतः ऊर्जा बचाने हेतु ऊर्जा कुशल यंत्रों का विकास आवश्यक है।

काम्पैक्ट फ्लोरोसेन्ट लैम्प (सीएफएल) ने गर्म बल्बों का स्थान ले लिया है। खुले बरतनों में खाना पकाने की विधि का स्थान भाप द्वारा तथा सौर ऊर्जा द्वारा भोजन पकाने की विधि ने ले लिया है। ऊर्जा संरक्षण हेतु बहुत सारे ऊर्जा कुशल यंत्र बनाए जा सकते हैं व बहुत सारी तकनीकों का प्रयोग किया जा सकता है। बहुत सारे उद्योगों में पुराने व अकुशल उपकरणों को नए व उन्नत यंत्रों द्वारा बदल दिया गया है।

डायमण्ड हॉट प्लेट, पीआरपी बैलगाड़ी (PRP Bullockcart) व ट्यूबवैल, इलेक्ट्रॉनिक गिट्टी (Ballast) उपकरण, जो विद्युत परिपथ में विद्युत-धारा को नियंत्रित करके ऊर्जा की खपत को कम करता है के अतिरिक्त डायमण्ड मोनो ब्लॉक लेथ (Diamond mono block lathe), प्राकृतिक जल शीतलक, सुधारित क्रीमेटोरिया (Improved crematoria) इत्यादि अन्य ऊर्जा कुशल उपकरण हैं, जिन्हें ऊर्जा संरक्षण हेतु प्रयोग किया जा सकता है।

प्राकृतिक जल शीतलक एक सुरक्षित पीने वाले पानी का उपकरण है जो ‘‘वाष्पीकरण द्वारा शीतलन’’ के सिद्धान्त पर कार्य करता है। इसके लिये वाह्य ऊर्जा के स्रोत जैसे विद्युत या बर्फ की आवश्यकता नहीं होती।

गुजरात सरकार, भारत द्वारा प्रोत्साहित सुधारित क्रिमेटोरिया प्रीफेब्रिकेटेड झूले के जैसे लोहे की संरचना वाला पर्याप्त दहन हेतु डिजाइन किया गया है। क्रिमेशन (दाह संस्कार) में लकड़ी का प्रयोग काफी हुआ है और लगातार पेड़ों को कटने से भी बचाया गया है।

ऊर्जा कुशल भवन

ऊर्जा संरक्षण हेतु बहुत सारे ऊर्जा कुशल भवनों का निर्माण किया गया है। उन्हें ऊर्जा कुशल बनाने हेतु विभिन्न प्रकार की तकनीकें प्रयोग की गईं। इन ऊर्जा कुशल भवनों के कुछ उदाहरण निम्न हैं:

(i) पारिगृह (Eco-house)

यह एक आवासीय भवन है जिसे मध्य सत्तर के दशक में बनाय गया। यह सौर कुकर व मल्टीफीड बायोगैस संयंत्र से सुसज्जित था। वर्षा जल संचयन का भी विचार था, परन्तु यह स्थापित नहीं किया गया। उन्हें ऊर्जाहितैषी बनाने हेतु विभिन्न प्रकार की तकनीकें प्रयोग की गईं। इस भवन में निम्नलिखित तकनीकों का प्रयोग किया गयाः

i. भूमिगत गड्ढे में वर्षाजल का संचयन
ii. छत पर लगा एकीकृत सौर जल हीटर
iii. खिड़की से लगा सौर कुकर
iv. मल्टीफीड बायोगैस संयंत्र, जिसे आवश्यकतानुसार सेप्टिक टैंक की तरह प्रयोग किया जा सकता है।
v. तीन विभिन्न प्रकार की प्रयोगात्मक छतें (खोखली कंक्रीट टाइलें (hollow concrete tiles), फ्रीफैब ईंट जैक मेहराब (Prefab brick jack arch), मद्रास छत (Madras terrace roof)
vi. वेनच्यूरा हेतु रचना (भीतरी आंगन द्वारा वायु संचार)

(ii) ऑरोविली आगंतुक केन्द्र

यह एक सार्वजनिक इमारत है जिसे 1989 में पॉण्डिचेरी में बनाया गया। बहुत सारी लागत, प्रभावी व वैकल्पिक तकनीकें मध्य अस्सी के दशक तक परिपक्व हो चुकी थीं। सभी चीजों को कार्यात्मक व सुखद पर्यावरण में एकीकृत करने का प्रयास बहुत सफल था और इसने 1992 में हसन फैथी अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार जीता। निम्नलिखित तकनीकें व उपकरण इनके निर्माण के दौरान प्रयोग किए गएः

i. संपीडित ईंटें
ii. फैरो-सीमेंट के छत चैनल व इमारती तत्व
iii. सौर चिमनियां (Solar Chimneys)
iv. वायु पम्प (wind pump)
v. सौर जल के साथ PV पम्प
vi. वायु जनित्र (wind generator)
vii. विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट जल प्रणाली (Decentralized waste water system)

(iii) सौर रसोईगृह (Solar Kitchen)

यह एक सामुदायिक रसोईघर है, जिसे एक दिन में 2000 व्यक्तियों के भोजन निर्माण हेतु बनवाया गया। इस संकल्पना का कार्यान्वयन 1994 में प्रारम्भ हुआ। दक्षिण भारत में सौर ऊर्जा की प्रचुरता के कारण भोजन पकाने हेतु ऊर्जा हस्तांतरण के लिये वाष्प एक स्पष्ट विकल्प था। सौर रसोईगृह में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:-

i. संपीडित ईंटें
ii. 10 सेमी. लम्बे फैरो सीमेंट के छत चैनल
iii. विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट जल प्रणाली, इमहॉफ टैंक (Imhoff tank)
iv. 15 मीटर व्यास का सांद्रक सौर कटोरा (Solar bowl concentrator)
v. सैफलर सामुदायिक सांद्रक कुकर (Scheffler community cooker concentrator)

ऑरोविली समुदाय हेतु एक सामूहिक रसोईघर है, सौर रसोईगृह की छत पर एक बड़ा ‘सौर कटोरा’ है।

इमहॉफ टैंक (Inhoff tank) अपशिष्ट जल उपचार हेतु उन्नत तकनीक वाला एक सेप्टिक टैंक है।

ऑसिलेटरी बैफल्ड रिएक्टर (Oscillatory baffled reactors OBR) की अभिकर्मकों, विलायकों व ऊर्जा के कुशल प्रयोग के कारण रासायनिक व दवा उद्योगों में मांग है। कचरे का उत्पादन कम से कम है।


ऊर्जा कुशल नए शहरों की संकल्पना

किसी भी व्यापक भूमि उपयोग योजना प्रक्रिया में ऊर्जा संरक्षण पर विचार किया जाना चाहिए। विभिन्न प्रकार के ताप स्रोतों जैसे ईंधन, तेल, गैस, लकड़ी, विद्युतधारा, सूर्य तथा कोयले इत्यादि का घरों व व्यापारिक भवनों का प्रयोग किया जाता है। इस ऊर्जा उपभोग व ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण इन दिनों एक ज्वलन्त विषय है। ऊर्जा संरक्षण के द्वारा पर्याप्त आर्थिक बचत की जा सकती है।

भूमि का प्रभावी प्रयोग ऊर्जा संरक्षण का एक अच्छा साधन सिद्ध हो सकता है। शहर की संरचना इस प्रकार की होनी चाहिए कि विकासीय घनत्व शहर के केन्द्र की ओर अधिक हो, जहाँ नगर निगम द्वारा पानी और सीवर की सुविधा हो। दूरस्थ क्षेत्रों में बहुत कम निर्माण करना चाहिए।

एक बस्ती को पर्यावरण अनुकूल बनाने हेतु उसके निवासियों का सहयोग आवश्यक है। एक शहर में पर्यावरण के अनुकूल भवन हो सकते हैं, परन्तु जब तक उसके निवासी किसी ऊर्जा संरक्षण और पारिहितैषी जीवन का संकल्प व अभ्यास नहीं करते, ऊर्जा कुशल शहर का उद्देश्य सफल नहीं होगा। शिक्षा, पारिहितैषी व्यवहार व पारिस्थितिकी अनुकूल मूलभूत सुविधाएँ एक सच्चे ऊर्जा कुशल शहर का निर्माण कर सकती हैं।

(i) शिक्षा

शिक्षा ऊर्जा संरक्षण हेतु जागरूकता उत्पन्न करने का सबसे अच्छा उपाय है। सभी शहरी सामुदायिक और दस्तावेजों पर संरक्षण संदेश के द्वारा एक ब्रांडेड कार्यक्रम बनाया जा सकता है। ऊर्जा संरक्षण संबंधित सूचनाएँ वेबसाइटों और स्थानीय केवल स्टेशनों पर उपलब्ध होनी चाहिए।

(ii) व्यवहार में बदलाव

ऊर्जा संरक्षण की ओर उचित दृष्टिकोण रखने के लिये निवासियों को कम वाहन चलाने और पैदल चलने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए और सार्वजनिक भवनों पर अधिक मोटरसाइकिल रैक स्थापित किए जाने चाहिए।

ऊर्जा संरक्षण की सबसे अच्छी विधि यह है कि कमरा छोड़ने पर बिजली की आवश्यकता न होने पर कम्प्यूटर को बंद कर देना चाहिए। जब उपकरण प्रयोग में न हों तो उन्हें स्विच से निकाल देना चाहिए। तापस्थायी (थर्मोस्टेट) को सर्दियों में बंद कर देना चाहिए और गर्मियों में बढ़ा देना चाहिए।

घर एवं व्यापार के अपशिष्टों का पुनर्चक्रण करना चाहिये। यह ऊर्जा संरक्षण के सकारात्मक परिणाम देगा।

(iii) अपनी आधारभूत सुविधाओं को पर्यावरण अनुकूल बनाना

बल्ब के स्थान पर ऊर्जा कुशल कॉम्पैक्ट फ्लोरसेन्ट बल्ब का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि इससे 75% ऊर्जा की खपत को कम करते हैं और साधारण बल्ब से 10 गुना ज्यादा चलते हैं। यंत्रों और कार्यालयों के उपकरणों को ऊर्जा प्रमाणित इकाइयों से बदल देना चाहिए। यह ऊर्जा के प्रयोग व लागत को कम करेगा।

पर्यावरण अनुकूल भवन

वर्तमान में यह विधि बहुत महँगी है। लेकिन ऊर्जा संरक्षण तत्व, जो कि परम्परागत उत्पादों से अधिक महँगे नहीं हैं, का प्रयोग किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त परिस्थिति, संरचना तथा भवन की बनावट, तापन, शीतलन व रोशनी हेतु आवश्यक ऊर्जा को अत्यधिक प्रभावित करती है। उचित संरचना, इमारत का अभिविन्यास बनावट तथा ढलान ऊर्जा संरक्षण के उपायों हेतु अवसर प्रदान करते हैं जैसे- निष्क्रिय सौर स्थान, घरेलू गर्म पानी गर्म करने की विधि, प्राकृतिक रोशनी और प्रकाशवोल्टीय विद्युत उत्पादन। इसके अतिरिक्त क्षय ऊर्जा संसाधनों के स्थान पर अक्षय ऊर्जा संसाधनों का प्रयोग अधिक किया जाना चाहिए। ऊर्जा संरक्षण में सहायक अन्य उपाय निम्नलिखित हैं:

(i) भवन संरचना व निर्माण विधियाँ ऊर्जा संरक्षण को प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए।
(ii) नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के प्रयोग का प्रोत्साहित करना चाहिए।
(iii) स्थानीय परिवहन आवश्यकताओं से संबंधित ऊर्जा को संरक्षित करना चाहिए।
(iv) लोगों में ऊर्जा संरक्षण हेतु जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिए।
(v) ऊर्जा स्तरों के अनुसार सामुदायिक आत्मनिर्भरता व स्वतंत्रता को बढ़ावा देना चाहिए तथा पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचाने वाले ऊर्जा संसाधनों के प्रयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए।
(vi) शहरों में ऊर्जा खपत कम करनी चाहिए
ऊर्जा के वैकल्पिक संसाधनों की सीमायें
जब मनुष्य जीवाश्म ईंधन के सीमित भण्डार के प्रति सचेत हुआ, तब उसने ऊर्जा के नवीकरणीय संसाधनों का प्रयोग करना आरम्भ किया। वर्तमान में ऊर्जा के वैश्विक संसाधन प्रयोग में लाये जा रहे हैं:

1. जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल व प्राकृतिक गैस) - 88%
2. नाभिकीय ऊर्जा (परमाणुओं का विखंडन व संलयन) - 05%
3. अन्य संसाधन (पन बिजली, ज्वारीय, वायु, भूतापीय, सौर, ईंधन की लकड़ी, ठोस अपशिष्ट तथा जैवभार (बायोमास संरक्षित ऊर्जा) - 07%

आप जीवाश्म ईंधन के सीमित साधनों व उनके प्रयोग के प्रभावों को भलीभांति जानते हो। आप पढ़ चुके हो कि ऊपर उल्लेखित अन्य संसाधन अक्षय हैं लेकिन उनकी भी कुछ सीमाएं है जो अगले पृष्ठ पर सारणीबद्ध हैं:-

ऊर्जा जाँच की अवधारणा

ऊर्जा जाँच, औद्योगिक ऊर्जा उपभोग को नियंत्रित करने व ऊर्जा क्षय के स्रोतों का पता लगाने का एक व्यवस्थित दृष्टिकोण है। इसके द्वारा किसी भी ऊर्जा संरक्षण कार्य को लागू करने व विकसित होने पर उसमें ऊर्जा संरक्षणों के अवसरों की खोज की जा सकती है। यह जांच कार्यक्रम किसी भी संस्था की ऊर्जा खपत को समझने व उसका विश्लेषण करने में सहायक होते हैं। जाँच कार्यक्रम द्वारा ऊर्जा की पहचान करने व कम करने में सहायक होते हैं।
ऊर्जा जाँच की भूमिका

ऊर्जा जाँच की प्रथम व प्रमुख भूमिका ऊर्जा उपभोग के क्षेत्र को पहचानना तथा अधिक खपत को पता लगाना है जिससे ऊर्जा संरक्षण के अवसरों को तलाशा जा सके। इस प्रकार से धन की बचत की जा सकती हैं। उदाहरण के लिये एक कारखाने की जाँच के दौरान उसके कर्मचारियों को ऊर्जा की बचत करने वाले उपकरणों के प्रयोग हेतु प्रशिक्षित किया जा सकता है। साथ ही उन्हें ऊर्जा संरक्षण की आवश्यकता हेतु भी सतर्क किया जा सकता है। अतः ऊर्जा खपत व ऊर्जा क्षति को कम करने हेतु यह एक व्यावहारिक बदलाव है।

यह एक स्पष्ट कथन है कि ऊर्जा की जाँच ऊर्जा संरक्षण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ऊर्जा प्रयोग का विश्लेषण

ऊर्जा उपभोग के क्षेत्रों को पहचान कर ऊर्जा के उपयोग का विश्लेषण किया जा सकता है। इस विश्लेषण का उपयोग प्रबंधन संरचना के पुनर्रीक्षण एवं ऊर्जा के नियंत्रण करने की विधियों के लिये किया जा सकता है। प्रति क्षेत्र वास्तविक ऊर्जा उपभोग को संयंत्र के विभिन्न स्थानों में उपमीटर लगाकर ज्ञात कर सकते हैं। यह डाटा ऊर्जा-उपभोग के निर्धारण में मदद कर सकता है। इस संयंत्र मैनेजर की मदद से सभी उपकरणों की सूची बनायी जा सकती है और उनके प्रयोग किये गये घंटों के बारे में पता लग सकता है। यह सूचना स्प्रेडशीट सूचना (Spread sheet information) का एक महत्त्वपूर्ण रूप में भूमिका निभा सकती है और इन चार्टों के परिणाम विश्लेषण के लिये उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।


सारणी 31.1: वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों की सीमाएँ
ऊर्जाईंधन के स्रोत
उत्पाद
लाभ
सीमाएँ
नाभिकीय ऊर्जा       
नाभिकीय विखंडन (परमाणुओं का टूटनातथा नाभिकीय संलयन।
- वाय प्रदूषण नहीं
-  ईंधन कुशल
- नाभिकीय संयंत्र के निर्माण की उच्च लागत।
- नाभिकीय सुरक्षा  दुघर्टनाओं का डर।
- नाभिकीय अपशिष्ट पदार्थों के निपटान की समस्या।
पन बिजली या हाइड्रोपॉवर
विद्युत उत्पाद हेतु नदियों पर बाँध बनाए गए।
- विश्व की अधिक जलीय
- विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता
बाँध के पीछे की अव्यवस्थित पारिस्थितिकी तंत्र।
बाँध के निर्माण हेतु मानव बस्तियों का विस्थापन।
वासस्थानों की हानि तथा अनुगामी जैव विविधता की हानि।
उच्च निमार्ण लागत।
उपजाऊ खेतों की हानि तथा नदी के नीचे पोषक तत्व युक्त तलछट की कमी।
सौर ऊर्जा
प्राकृतिक सूर्य की रोशनी से
- पर्यावरण अनुकूल
- पर्याप्त या असीमित उपलब्धता
- सूर्य की रोशनी के संचयन की सीमित क्षमता।
- बादल मनुष्य की आवश्यकताओं में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।
- महँगे संचयन उपकरण।
वायु ऊर्जा
प्राचीन काल से फसलों की सिंचाई हेतु पंखों द्वारा वायु को नियंत्रित किया जाता है।
- प्रदूषण रहित
- मुफ्त उपलब्धता
- हर जगह नहीं उपलब्ध या समय-समय पर उपलब्ध।
- वायु मिलों के पंखे उड़ने वाले पक्षियों  हवाई जहाज के लिये दृश्य बाधा उत्पन्न करते हैं। (दृश्य प्रदूषण)
ज्वारीय ऊर्जा
उचित संरचनाओ द्वारा ज्वारीय ऊर्जा का उपयोग
- मुफ्त तथा स्वच्छ
ऊर्जा उपयोग हेतु प्रयोग किए जाने वाले उपकरण (प्लान्टमहँगे हैं।
प्लान्ट मुहानों के प्राकृतिक बहाव को बाधित करते हैं और क्षेत्र में प्रदूषकों के सांद्रण को बढ़ाते हैं।
प्लान्ट/मुहानों के प्राकृतिक बहाव को बाधित करते हैं।
भूतापीय ऊर्जा
भाप हेतु कुएँ खोदे जाते हैं जो वैद्युत जनित्रों को शक्ति देते हैं। भाप भूमिगत जल केउस क्षेत्र के कारण स्वतः वाष्पित होने से उत्पन्न होती है।
- पर्यावरण अनुकूल
वाष्प में हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) होती है जिससे सड़े अण्डों की गंध आती है।
वाष्प में उपस्थित खनिज पाइप लाइन  उपकरणों के लिये संक्षारक होते हैं  प्रबंधंन समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।
पानी में उपस्थित खनिज मछलियों के लिये विषाक्त होते हैं।
जैविक (बायोमासऊर्जा
(1) ईंधन की लकड़ी
पेड़ों की लकड़ियों की ईंधन हेतु कटाई या उन्हें सीधे जला देना।
- सस्ता है  अविकसित तथा विकासशील देशों में बहुत प्रचलित है।
तुलनात्मक रूप से निम्न ऊर्जा स्तर।
भारीअतः परिवहन में कठिनाई।
लकड़ियों के जलने से वायु प्रदूषण होता है।
ईंधन की लकडि़यों हेतु जंगलों को काटा जाता हैजिससे रेगिस्तान बनते हैं।
अधिक मात्रा में राख की उत्पत्ति।
(2) बायोमास परिवर्तन
रासायनिक ऊर्जा से ऊर्जा प्राप्त करना। बायोमास (या जैविक संसाधनोंमें संरक्षित। ऊर्जा के लिये भोजन हेतु उन्हें सीधे जलाना या इथेनॉल  मीथेन द्वारा विद्युत उत्पन्न करना (बायोमास)
- नवीकरणीय ऊर्जा
भोजन का अभाव हो सकता है क्योंकि पोषक तत्व जीवों से मृदा में नहीं पहुँचते।
इथेनॉल हेतु मक्के को उगाने में एल्कोहल से प्राप्त ऊर्जा से अधिक ऊर्जा व्यय होती है।
भोजन के लिये प्रयोग की जाने वाली भूमि का ईंधन रूपांतरण हेतु जीवों की वृद्धि के लिये उपयोग किया जाता है।
(3) ठोस अपशिष्ट
अपशिष्ट पदार्थों की छंटनी की जाती है  ज्वलनशील पदार्थ अलग किए जाते हैं।
- ताजा निपटान की लागत को कम करता है।
- भूमि भरने की आवश्यकता को कम करता है।
इसके जलने से CO2 अन्य गैसें उत्सजिर्त होती हैंजिससे वायु प्रदूषण होता है।
अपशिष्ट पदार्थों जैसे प्रक्षालित कागजों  प्लास्टिक में क्लोरीन होती है जो डायोक्सिन बनाते हैं जो कि अत्यधिक विषैले होते हैं  कैंसर उत्पन्न कर सकते हैं